

(ahhhh) हमने अपने महबूब का महबूब भी देखा,
एक अजीब सा तमाशा-ए-तकदीर भी देखा।
जिस आँख में सजते थे
कभी ख़्वाब हमारे,
उन आँखों में किसी और की तस्वीर को देखा।
हम खड़े ही रह गए राह-ए-तमन्ना में यूँ ही,
वो गुज़र गए किसी और का हाथ थाम कर।
जो दुआएँ
माँगी थी हमने तनहा रातों में,
उन्हें रंग लाते देखा किसी और के नाम पर।
अपनी ही वफ़ा का ये कैसा अंजाम देखा,
हमने अपने महबूब का महबूब भी देखा। (ooh-ooh)
ना कोई शिकवा होठों पर आया,
ना कोई आह उठी,
बस एक ख़ामोशी सी दिल के
कोने में ठहर गई। वो मुस्कुरा रहे थे देखकर जिस शख्स की
ओर, हमारी तमाम ख़्वाहिशें
उसी मुस्कान पर बिखर गई।
वो चाँद जो कभी मेरी अंधेरी रातों का नशा था,
आज किसी और के
आशियाने में ढलने लगा। जो चिराग़ हमने जलाया था अपनी चाहत की
लौ से, वो किसी और की महफ़िल को
रौशन करने लगा।
अपनी
ही रोशनी को यूँ हमसे बेगाना होते देखा,
हमने अपने
महबूब का महबूब भी देखा। (ahhhh)
अब ना कोई गिला है ज़माने से,
ना उनसे कोई शिकायत,
अगर उनकी ख़ुशी वही है,
तो ये ही सही।
हमने तो बस आशिक़ी
की थी बेइंतहा,
दर्द ही मिला इनाम में,
तो ये नसीब ही सही। खुद को मुकम्मल हारकर,
उनकी जीत का मंज़र देखा,
हाँ, हमने अपने
महबूब का महबूब भी देखा।