

घर की सफ़ाई करते-करते,
कोने में कुछ दिखा,
धूल में आधी छुपी हुई,
मेरी साइकिल थी खड़ी वहाँ। जंग लगी थी हैंडल पर,
सीट भी थोड़ी टूट गई,
उसे छुआ तो जाने कैसे,
मेरी उम्र ही लौट गई।
पीछे पापा दौड़ रहे थे,
माँ दरवाज़े पर खड़ी,
मैं डरते-डरते चल रहा था,
और दुनिया लगती बड़ी。
पहिए घूमे,
बचपन लौट आया, एक पुराना रास्ता,
फिर मुझे बुलाया। पहिए घूमे,
वक़्त थम सा गया,
जो लड़का कहीं खो गया था,
वो मुझमें फिर मिल गया।
पहली बार जब गिरा था,
घुटना पूरा छिल गया,
पापा बोले "उठ बेटा," और डर मेरा निकल गया। स्कूल की वो
नीली बोतल, हैंडल पर बँधी हुई,
हर सुबह उसी साइकिल पर,
मेरी दुनिया चली हुई।
आज सड़कें बड़ी हैं,
गाड़ी भी मेरे पास है,
पर उस छोटी साइकिल जैसी,
किसी चीज़ में बात कहाँ है।
मैंने उसे साफ़ किया फिर,
हवा भर दी पहियों में,
एक चक्कर घर के बाहर,
बस अपने पुराने दिनों में।
पहिए घूमे,
बचपन लौट
आया, एक पुराना रास्ता,
फिर मुझे बुलाया। पहिए घूमे,
दिल मुस्कुरा गया, जिस घर को छोड़ दिया था,
वो घर मुझमें रह गया।