

ये कोई
खत नहीं… एक अधूरी
चीख है…
तूफ़ानी रातों में तेरा नाम मिला,
भीगे हुए खत में दर्द छुपा मिला,
हर एक लफ़्ज़ जैसे रोता रहा,
भास्कर… मुझे बचा लो ज़रा… सन्नाटों में कोई आवाज़ थी,
अंधेरों में छुपी एक राज़ थी,
मौत भी जिसके आगे डरे,
भास्कर फिर भी आगे बढ़े…
मिस्टेरियस लेटर… मुझे बुलाए,
हर धड़कन में डर जगाए,
इन अंधेरों से लड़ना होगा,
अब हर सच को पढ़ना होगा… डिटेक्टिव भास्कर नाम है उसका,
खौफ से लड़ना काम है उसका,
जब तक ये साँसें चलती रहें,
हर राज़ से पर्दा
उठता रहे… टूटी हुई दीवारों के बीच,
छुपी हुई थीं यादें
कई, खून से लिखी वो आख़िरी बात,
सच को ढूँढना… चाहे हो रात… हर चेहरा अब नकाब में है,
हर दिल किसी हिसाब में है,
लेकिन उम्मीद अब भी जिंदा है,
भास्कर की आँखों
में बदला है… मिस्टेरियस लेटर… आग लगाए,
सोए हुए जज़्बात जगाए,
अब अंधेरा हार ही जाएगा,
सच फिर से लौट ही आएगा… डिटेक्टिव भास्कर आगे बढ़े,
हर डर की दीवारें तोड़े,
चीखती रातें थम जाएँगी,
जब सच की सुबह आएगी…
कुछ खत…
कभी खत्म नहीं होते…